
आँखें मिली मगर मेरी चाहत न मिल सकी।
उल्फ़त में कोई दिल से इज़ाज़त न मिल सकी।
चाहा था जिसको मैने दिल-ओ-जान से कभी,
वो बे-वफ़ा मुझे मेरी निस्बत न मिल सकी।
मज़लूम दर-बदर यूँ भटकता ही रह गया,
इन्साफ़ को मगर वो अदालत न मिल सकी।
ये दर्द-ओ-गम तुम्हारा भला कैसे जानता,
तेरी तरफ से कोई शिकायत न मिल सकी।
मंजिल पे आ के पाँव मेरे फिर फिसल गये,
लगता ख़ुदा की मुझको इनायत न मिल सकी।
उल्फ़त के कैदखाने में मुद्दत से कैद हूँ,
पर वस्ल की मुझे तो जमानत न मिल सकी।
*अम्बुज* बिका ज़मीर शरीफों के शहर में,
सच बोलने की मुझको भी हिम्मत न मिल सकी।
चनरेज राम अम्बुज




