
अदब कायदा नियम व संयम, आज सभी जन भूल गये,
इसीलिए शायद जग में स्वप्न सभी के चूर हुए,
जैसा अन्न ग्रहण करे मानव,
बुद्धि परिष्कृत वैसी होती,
औरों के फूल की वकत नहीं, अपने कहते हो हूर हुए।।
मत आंख का पानी इतना मारो दिखना ही भूल जाए तुमको,
सौहार्द,सहिष्णुता बागी बन जाए,तेरा ही नाश करे तुमको,
रहते समय चेत जाओ,मत चुप्पी का अपमान करो,
उसके अंदर स्नेह के बदले किसने घृणा का अधिकार दिया तुमको।।
मत और अधिक कुछ कर प्यारे इल्तिज़ा मात्र इंसान तू बन ले,
औरों के लिए नहीं कुछ कर, अपने सुकर्म की माला जप ले,
आनंद अलौकिक मिलेगा तुझको एक बार ऐतबार तो कर ले
विश्वास अगर फिर भी न हो,तो जो मन आए वहीं तू कर ले।।
अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश




