साहित्य

पतंग

शिवा सिंहल

जिंदगी है छोटी सी,थोड़ी सी है आशा,
जिंदगी में कुछ पल मुस्कुरा ले छोड़ दे निराशा।

दूर गगन में उड़ती पतंग सी जिंदगी हमारी,
जाने कब उलझ के टूट जाए सांसों की डोर प्यारी।

अरमानों के पंख लगा गगन में इतना ना इतराओ,
वक्त की आंधियों से पेड़ों में अटक आंसू ना बहाओं ।

धन दौलत और माल खजाना यही धरा रह जाएगा,
जैसे पतंग से डोर टूटी मंजा हाथ में पतंग पकड़ ना पाएगा।

यारों पतंग की डोर सी लिपटी है जिंदगी,
कभी टूटी ,कभी बिखरी तो कभी संवरी है जिंदगी ।

जिंदगी पे दोस्तों किसका जोर है,
किसके रोके रुके ये मचाती शोर है।
जिंदगी कठपुतली कर नाच नचा गई,
भूली बिसरी यादों में पतंग सी उलझा गई।
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शिवा सिंहल आबुरोड

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