
गर्मी में झुलसते हैं,सर्दी में ठिठुरते हैं।
बारिश में भीगते हैं,अथक परिश्रम करते हैं।।
ले आरजू काम की,रोज घर से निकलते हैं।
नसीब अच्छा तो काम मिलता,
नहीं तो बेरंग घर लौटते हैं।।
जब बेरंग लौटते हैं, घर में चूल्हे न जलते हैं।
सुकूं ये रात का खोते,मासूम भूखे बिलखते हैं।।
तड़पते देख अपनों को,ये बस घुटते रहते हैं।
पर अपनों की उम्मीद की खातिर
मुस्कुराकर सब दर्द सहते हैं ।।
हर चौराहे पे मिलते हैं,सबके ताने सुनते हैं ।
ये बहादुर होते हैं कभी आश न खोते हैं ।।
संघर्ष जीवन भर करते हैं,बड़े खुद्दार होते हैं।
इन योद्धाओं को हम सब मज़दूर कहते हैं।।
#नोएडा
डॉ. उदयवीर सिंह




