साहित्य

कोहरे में

जयचन्द प्रजापति 'जय'

कोहरे में
मैं कुछ दूर चला

बहुत लोग ठिठुरे हुये मिले
कुछ आग तापते मिले

कुछ सड़को पर पन्निया बीनते
कुछ औरते छोटे-छोटे बच्चों के साथ

भीख मांगती हुई सड़को पर
बहुत ही कम कपड़ो में

कुछ रईसजादियां लड़कियां भी
सड़को पर कम कपड़े में दिख रही थी

एक विपन्नता में कम कपड़े पहना है
एक सम्पन्नता में कम कपड़े पहना है

जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

कविता का भावार्थ 

यह कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’ द्वारा प्रयागराज में रचित एक मार्मिक सामाजिक टिप्पणी है, जो कोहरे की ठंड में सड़कों पर घूमते हुए समाज की विडंबनाओं को उजागर करती है। कवि कोहरे में कुछ दूर चलते हुए ठिठुरते लोगों को देखता है—कुछ आग तापते, कुछ पन्नी (प्लास्टिक) बीनते, औरतें छोटे बच्चों संग भीख मांगतीं, जो बहुत कम कपड़ों में दाने की तड़प झेल रही हैं। फिर, विपरीत दृश्य उभरता है: रईसजादा लड़कियां भी सड़कों पर कम कपड़ों में नजर आती हैं।

अंतिम पंक्तियां इसकी चरम विडंबना रेखांकित करती हैं—’एक विपन्नता में कम कपड़े पहना है / एक सम्पन्नता में कम कपड़े पहना है’।यहाँ गरीबी और समृद्धि दोनों की ‘नग्नता’ का सूक्ष्म चित्रण है। विपन्नों के लिए कम कपड़े मजबूरी हैं, जो ठंड व अभाव की मार को दर्शाते हैं, वहीं सम्पन्नों के लिए यह फैशन या अभिमान का प्रतीक है। कोहरा केवल मौसमी धुंध नहीं, बल्कि सामाजिक अंधकार का रूपक है, जो वर्ग-भेद, असमानता और आडंबर को छिपा लेता है। कवि ठंडे वातावरण में मानवीय संवेदना जगाता है,

सवाल उठाता है कि क्या वास्तविक ‘ठिठुरन’ शारीरिक है या नैतिक? यह हिंदी साहित्य की व्यंग्यात्मक परंपरा में ‘जय’ की संवेदनशीलता को प्रतिबिंबित करता है, जहाँ रोजमर्रा के दृश्य से गहन सामाजिक आलोचना निकलती है।

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