आलेख

सावन

नीलम अग्रवाल "रत्न"

आज कई दिनों बाद बेटी का फोन आया । उससे बात करके बहुत अच्छा लगा । बातों ही बातों में मैंने उससे कहा, बेटी इस बार रक्षाबंधन पर यहाँ आ जाओ । वैसे भी नौकरी के चक्कर में मायके आना तो दूर मुझसे बात करने तक का तुम्हें समय नहीं मिलता । मेरी ये बात सुनकर तो जैसे उसे कोई बिजली का झटका लगा हो । उसने चौंकते हुए कहा, अरे ! हाँ मम्मी ! सावन आने वाला है मुझे तो ध्यान ही नहीं रहा । अच्छा मम्मी अब फोन रखती हूँ । अभी मेरी क्लाईंट मीटिंग शुरू होने वाली है । और उसने झटके से फोन काट दिया ।
सावन आने का उसका इस तरह आश्चर्यचकित हो कर पूछना मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी । क्योंकि आज पैसा कमाने के चक्कर में हर किसी की जिंदगी इतनी उलझ गई है कि हिंदुत्व संस्कार बहुत पीछे छूटते जा रहे हैं । और न चाहते हुए भी मैं अपने अतीत को याद कर मुस्कुराने लगी । हमारे लिए सावन का महीना कितना खास हुआ करता था । बारिश का मौसम आते ही हम बेसब्री से सावन का इंतजार करने लगते थे । चारों तरफ हरियाली, मेंहदी के पेड़ो की खुशबू, मेंहदी के पत्तों को पीसकर उसका रस निचोड़ना, बागों के झूले, सखियों के साथ मस्ती, मेंहदी से रचे हाथ, तीज का त्यौहार, घेवर की सौंधी -सौंधी खुशबू, शिवालय की रौनक, नागपंचमी का त्योहार, सोमवार के व्रत, राखी का त्योहार इन सब में कितना मजा आता था । शादी से पहले ही हमें हर तीज त्योहार की जानकारी हुआ करती थी । शादी के बाद मायके से सिंधारा आने का कितना इंतजार रहता था ।
अब तो ज्यादातर बहु बेटियों को हिंदी महीनों के नाम तक नहीं आते । तो फिर तीज त्योहारों की जानकारी तो दूर की बात है । यही सब सोचते हुए काफी समय तक अपने आप से बातें करती रही । फिर अचानक याद आया, अरे मायके राखी भेजनी है । बेटी के यहाँ सिंधारा भेजना है । अपने लिए हरि चूड़ियाँ लानी है ।इसके लिए किसी दिन बाजार जाना पड़ेगा ।
हमें तो आज भी सावन का महीना बहुत सुहाना लगता है । पूरी वसुधा मानो हरित शृंगार से सज जाती है । मोर पपीहे भी सावन का आनंद लेने लगते हैं । कभी रिमझिम बूँदे, कभी मूसलाधार बारिश, हाथों में छतरी, चारों तरफ हरियाली । सावन के आते ही जैसे पूरी प्रकृति भक्तिमय हो जाती है । बाजार में हर तरफ राखी और हरी चूड़ियां बेचने और खरीदने वालों की भीड़ रहती थी । हर तरफ फूल के साथ बेलपत्र, भांग के पत्ते, धतूरा के फूल आदि जो भोलेनाथ को पसंद है वो सारी सामग्री बाजार में दिखने लगती है । अंतर्मन अपने आप ही बम -बम भोले, हर -हर बम -बम उच्चारण करने लगता है । मन गौरा माँ से सौभाग्य की कामना करने लगता है । रही बात सिंधारा की, तो अब न माँ है न सास है तो अपना सिंधारा मैं खुद ही मना कर खुश हो लेती हूँ ।

नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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