
है थकावट बहुत पर चलता रहूंगा।
हौसलों के साथ में बढ़ता रहूंगा।
अब संभालना आ गया टूटा बहुत में।
अब मैं तूफानों से भी लड़ता रहूंगा।
ज़ख्म कितने हर कदम मिलते रहे हैं।
झेल कर हर वार में हंसता रहूंगा।
उनकी तो फितरत गिराते ही रहे वो।
वो गिराए लाख में उठता रहूंगा।
दौर उनका है हुकूमत भी उन्हीं की।
बात सच आखिर तलक कहता रहूंगा।
राह फूलों की बहुत आसान है पर।
शूल पर “आकाश” में चलता रहूंगा.।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




