
दिन की थकन समेटे धीरे,
शाम उतरती गली–डगर।
सूरज ओढ़े सिंदूरी चादर,
क्षितिज लगा स्वर्णिम नगर।
पंछी लौटें नीड़ बसेरे,
थिरक उठी है शीतल पवन।
दीप जले जब आँगन-आँगन,
मौन रचे अपना आलिंगन।
नील गगन पर तारे टाँके,
रजनी का कोमल श्रृंगार।
शाम का यह आवरण ओढ़े,
शांत हुआ सारा संसार।
चूल्हों से उठती सुगंध मिली,
रोटी में घुला स्नेह अपार।
माँ की ममता आँचल-सी,
शाम ओढ़े करुण उपहार।
गलियों में हँसी बिखरती,
थकन पिघलती पल-पल में।
दीप-शिखाएँ पहरा देतीं,
सपनों के कोमल संकल्प में।
रात के होंठों पर चुपके,
शाम लिखे मीठा विश्वास।
आवरण यह ढक ले जग को,
दे जीवन को शांति-आश्वास।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




