साहित्य

मन की देहरी पर उजास

सुनील कुमार महला

तुम रखना खामोशियाँ
शोर के बीच भी मन की
सबसे सच्ची आवाज़ बनाकर।

रख देना आँसू
दरवाज़े के बाहर,
क्योंकि भीतर मुस्कान का
हक़ अब तुम्हारा है।

फेंक देना सारी ईर्ष्याएँ,
जो मन को भारी करती हैं,
और झाड़ देना सारा अहम्,
जो आत्मा को छोटा कर देता है।

गुलाब की कलियों की
थोड़ी-सी महक रखना साथ,
ताकि हर सुबह
नए विश्वास से महके।

रखना आशीर्वाद हाथों में,
कदमों में धैर्य,
और आँखों में उजास,
जो अँधेरों से डरता नहीं।

दुआओं में रखना जगह,
अपने लिए भी,
क्योंकि जो खुद को
प्रेम देना सीख लेता है,
वही दुनिया को
रौशनी दे पाता है।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।मोबाइल 9828108858

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