साहित्य

ये गरीबी और आज का आदमी

कुलदीप सिंह रुहेला

ये गरीबी और आज का आदमी,
हर रोज़ नए ज़ख़्म सिलता है आदमी।
सपनों की गठरी कंधे पर ढोए,
रोटी के बदले खुद को तोलता है आदमी।

सुबह की चाय भी कर्ज़ में पीता,
शाम को उम्मीद में जीता है आदमी।
बच्चों की हँसी जेब में खोजे,
आँसू छुपा कर हँसता है आदमी।

महलों की रौशनी दूर बहुत है,
फुटपाथ पे चिराग़ जलाता है आदमी।
मेहनत की मिट्टी हाथों में लगी,
फिर भी खाली थाली पाता है आदमी।

काग़ज़ों में योजनाएँ सोती हैं,
हकीकत में भूखा सो जाता है आदमी।
मेहनत का दाम पूछे जो कोई,
तो किस्मत का नाम बताता है आदमी।

फटे जूतों में चलता रहता है,
फिर भी सर ऊँचा रखता है आदमी।
हालात चाहे जितने भी पत्थर हों,
दिल में इंसानियत बचाता है आदमी।

ये गरीबी और आज का आदमी,
हर हाल में खुद को निभाता है आदमी।
कल बदलेगा ये दौर यक़ीन है उसे,
इसी उम्मीद पे गुनगुनाता है आदमी।

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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