
संसारी जन भूलते, मर्यादा को आज।
बालाओं की छिन रही,बाजारों में लाज।।
आजादी जलकर हुई, अंगारों में राख।
आज बँधी वृषभानुजा,मर्यादा की शाख।।
लक्ष्मी थी वीरांगना,क्षत्राणी बेजोड़।
मर्यादा में ही लड़ी,जंजीरों को तोड़।।
सूरज उगे प्रभात में, तम का मिटा प्रभाव।
फैला जगत प्रकाश जो,मन का घटा दुराव।।
मात भारती का करूँ,चरण वन्दना अद्य।
ज्ञानदायिनी ज्ञान को, मुझे दीजिए सद्य।।
करूँ छन्द की साधना,वरद दीजिए हस्त।
कृपा भारती आपकी,शब्द जोड़ता मस्त।।
हिये रागिनी छेड़िये, मधुर वादिनी आज।
सप्त सुरों को जोड़िए,सुघर कीजिए काज।।
चनरेज राम अम्बुज




