साहित्य

फर्क

पूनम त्रिपाठी

बहुत फर्क पड़ता है,
पर लोगों को कहने देते हैं,
क्योंकि जवाब देना
हमारी सही नहीं
हर किसी को समझा
नहीं सकते हम,
कुछ बातें अनुभव
मांगती हैं,
और अनुभव
हर किसी की झोली
में नहीं होते।
इसलिए कई सवालों को
मौन में ही रहने देते हैं।
किस्मत को मोड़ना
हमारे बस में नहीं होता,
तो वक़्त की धारा के साथ
खुद को बहने देते हैं।
जानते हैं कि बहना कमज़ोरी नहीं,
कभी-कभी
ज़िंदा रहने की यही
समझदारी होती है।
हम मुस्कुरा लेते हैं
जब भीतर बहुत कुछ
टूट रहा होता है,
क्योंकि दुनिया को
हमारे आँसू देखने
की आदत नहीं।
लोग हँसी देखते हैं
और मान लेते हैं
कि दर्द कहीं होगा ही नही
हमने अब सीख लिया है
सब कुछ कहना ज़रूरी नहीं,
कुछ बातें
दिल में ही पक कर
ज़्यादा सच्ची हो जाती हैं।
हर मोड़ पर सफ़ाई देना
आत्मसम्मान का अपमान होता है।
जो समझना चाहते हैं
वो खामोशी में भी समझ लेते हैं,
और जो नहीं समझना चाहते
उन्हें हमारे कहे हुए शब्द भी
कभी राज़ी नहीं कर पाते।
इसलिए अब
हम अपने हिस्से का सच
खुद के पास रखते हैं,
वक़्त को गवाह मानते हैं
और आगे बढ़ते जाते हैं—
धीरे… मगर पूरे विश्वास के साथ।

पूनम त्रिपाठी
गोरखपुर स्वरचित ✍️

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