साहित्य

तन्हा

राजीव त्रिपाठी

ज़िन्दगी बोझ लगने
लगती है जब कोई,
तन्हा होता है!!
ख़ूँ के आंँसू पीने लगता है
ज़ार-ज़ार रोने लगता है!!
नींद नहीं आती है ऐसे में,
करवट बदल बदल सोता है!!
अपना भी याराना देखो कैसा,
है महसूस करो!!
दोस्त वक़्त पर काम आता है
सपना ऐसा सजोने लगता है!!
अस्ताचल का सूरज देखो
पर्वत सा ओढ़े लगता है!!
जीवन का क्या मोल है समझो,
ना आने दो ग़लत-फ़हमियों को!!
तन्हाई के नाम पर देखो
रिश्ता दूर होने लगता है!!
लाख संभालेगी यह दुनिया
फिर भी अपना अपना होता है!!
ज़िन्दगी बोझ लगने
लगती है जब कोई,
तन्हा होता है…

– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान

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