साहित्य

निः स्वार्थ

नीलम अग्रवाल "रत्न"

मांँ जगत निःस्वार्थ की मूरत ।
देख जीती लाल की सूरत ।।
पूजती है देव वह न्यारे ।
कष्ट हरती लाल के सारे ।।

प्यार है निःस्वार्थ माता का ।
स्थान ऊंँचा जन्म दाता का ।।
मांँगती वरदान इतना वह ।
दीर्घजीवी सूर्य जितना यह ।।

लाल मेरी आंँख का तारा ।
नाज करता आज कुल सारा ।।
लाज रखना दूध की लाला ।
मातु ने निःस्वार्थ है पाला ।।

नाम रौशन वंश का करना ।
धर्म की ही राह पर चलना ।।
तुम करो निःस्वार्थ जग सेवा ।
हाथ धर आशीष का देवा ।।

देव पितृ तर्पण सदा करना ।
शाम दीपक रोज ही धरना ।।
मातु पितु निःस्वार्थ कर सेवा ।
जन्म दाता से मिले मेवा ।।

नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
🙏🙏

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