साहित्य

काश! कुछ बेटों को भी सिखाया होता

सौ, भावना मोहन विधानी

बढ़ी तेजी से जमाना बदल रहा है,
बेटियों का अब सिक्का चल रहा है।
पहले जो घर तक रहती थी सीमित,
अब वह छूने लगी है सारा क्षितिज।

घर कामों के साथ पैसे भी कमा लेती हैं,
अपनों को सारी दुनिया घूमा लेती है।
नहीं किसी सहारे की अब मोहताज है,
खुद ही अपने सर पर पहनाया ताज है।

काश! कुछ बेटों को भी सिखाया होता,
आत्मनिर्भर होना उनको भी आया होता।
तो यूं जरा सी बातों पर रिश्ते नहीं टूटते,
फिर कभी हाथों से हाथ नहीं छूटते।

घर और बाहर में अब तालमेल बिठाना,
कुछ घर के कामों में भी हाथ बंटाना।
बेटे भी जब आज सर्वगुण संपन्न बनेंगे,
तभी उनके घर सच्ची खुशियों से सजेंगे।

बेटियों के साथ बेटे भी घर की जिम्मेदारी निभायें,
वह भी अपने आचरण में संस्कार और मर्यादा लायें।
आधी आधी बांट दो फिर हो घर की इज्जत या संपत्ति,
दोनों संस्कारी होंगे तो ही दूर होगी सारी विपत्ति।

सौ, भावना मोहन विधानी
अमरावती महाराष्ट्र।

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