
चलो ज़रा पीछे मुड़कर देखें,
बीते वक्त में प्रवेश कर देखें,
उन झुरमुटों पर निगाहें डालें,
चलचित्र सी रील चल जाएगी। गुज़री ज़िन्दगी यादों की किताब है।
चलो ज़रा शनै: शनै: पृष्ठ पलटते हैं।
हर पृष्ठ बीते लम्हों को तरो-ताजा
करते हैं।
कभी अधर मुस्काते हैं, कभी आँखें नम हो जातीं हैं।
वक्त फिसलता जाता है,
तब पुनः गुज़रा ज़माना जी लेते हैं।
सब कुछ एहसासों में पी लेते हैं।
यादों की किताब में इक पृष्ठ आज का भी जोड़ लेते हैं।
आगत कल के स्वप्न आँखों में सजाए,
साँसों की चादर ओढ़ नींद के आगोश में डूब जाते हैं।
सुषमा श्रीवास्तव,
©®,रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर,उत्तराखंड।




