
हँसी तुम्हारे चेहरे पर,
जैसे है सुबह की उजली धूप,
जो भर देती है दामन मेरा-,
खुशियों से-
उमंगों से-
चाहतों से-
गुस्सा तुम्हारे चेहरे पर,
जैसे नीरवता का अंधकार,
जो घेर लेती है मुझे-,
उदासी से-
निराशा से-
मायूसी से-
ऐसे में मैं घिर जाती हूँ मैं,
अनगिनत सवालों से कि-
तुम्हारे कौन से रूप को,
मैं सच मानूँ?
पर मुझे पता है,
अभी मुस्करा दोगे तुम,
क्योंकि-
एकाएक आँधी का आना,
प्रकृति का एक रूप है,
उसका स्वभाव नहीं।
——————-डॉ. संगीता पाण्डेय “संगिनी ”
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, (पी, एस, एम, पी.जी. कोलेज, कन्नौज )




