
रंग भरा यह उत्सव पावन,हर्षित बालक वृद्ध सभी जन।
गंध सुगंध उड़े घर आँगन,माल पुआ गुझिया खुशबू धन।।
रंग बिरंग लगे जग मोहक,आज खुशी भर झूम रहा मन।
लाल हरा हर ओर दिशावर, दौड़ रहे सब भींग रहा तन।।
रंग बिरंग गुलाल लिए कर,संग सखी निकली सब ग्वालिन।
ढूँढ रही अब माधव को सब,व्याकुल नीर बहे पनिहारिन।।
संग सखा छलिया मनमोहन,केशव भेष धरे मनिहारिन।
कौन गली मधुसूदन हैं अब,हार गई सखियां सब लालिन।।
प्रेम समा हिय ग्वालिन कोमल,माधव गाल मले मन भावन।
प्रेमिल पागल रंग लगाकर,नैनन नीर विलोचन सावन।।
रंग बिरंग गुलाल उड़ाकर,आज लगे ब्रज दृश्य सुहावन।
भाव भरे सब देख रहे छवि,रूप लगे अति आज लुभावन।।
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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