
स्त्री प्रकृति है
प्रकृति कभी किसी की ग़ुलाम नहीं होती है
नारी बंदनवार है
नारी संध्या दीप
नारी बिना सृष्टि नहीं
यही जगत आधार
हां वह अवश्य ढोती है
जरूरत से ज़्यादा बोझ
नारी इक बहती नदी
जीवन करे निहाल
खुशियों को रखती संजोकर
ज्यों मोती को सीप
सूना है नारी बिना
सारा यह संसार
यह मकान को घर करे
देकर अपना प्यार
पहनावा ही ग़लत था
किया सभी ने सिद्ध
चिड़िया रोती रह गई
बरी हो गए गिद्ध
बने आर्थिक रूप से
नारी सभी सशक्त
बदलेगा यह देश तब
यही कह रहा वक्त
संस्कृति की वाहक यही
इससे ही सभी रीति रिवाज़
नारी ही निर्मित करे सुंदर सभ्य समाज।।
डॉ. अनीता शाही सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर
प्रयागराज



