साहित्य

नारी तू ही नारायणी

बसंत कुमार श्रीवास

हे ईश्वर, है नमन आपको,
जग में बनाये सुशील नारी।
दया मया,करुणा के सागर,
और है जगत आधार नारी।।

नारी का मन तो कोमल पंखुड़ी,
अपमान सदा वे सहते जाती हैं ।
पर पढ़ पाओ जब मन नारी का,
तो नारी ही नारायणी कहलाती हैं।।

सरस्वती, कमला और नारायणी
करुणा शौर्य की परिभाषा नारी है।
होकर बहु, बहन बेटी पत्नी सखी,
सीता द्रौपदी कौशिल्या सम नारी है।।

फिर भी क्यों आज डरती हैं नारी,
खुद के हौसले का उड़ान भरने दो।
नारी समझ के न बांधो पग बेड़ियां,
स्वाभिमान का भी ताज छू लेने दो।।

नारी के भी हैं सपनें,स्व अपने,
बांध सीमा अपमान न होने दो।
ऊँचाई की बुलंदीयों में जाकर,
सफल नारी का सम्मान होने दो।।

नारी में भी है साहस और शक्ति,
इतिहास क्यों लोग भूल जाते हैं ।
इसी युग की है जातक मां पन्ना,
सरोजनी,लता,सावित्री याद आते है।।

मीरा बाई का देखो प्रेम–भक्ति,
रानी लक्ष्मी वीरता दिखलाती है।
मत होने दो अब नारी को बेचारी,
नारी ही जग-जननी कहलातीं है।।

न हुआ है जनम तो केवल मेरा,
सम्पूर्ण जग,की जननी नारी है।
हम ऋणी है, सब उस नारी की,
जिसने जग में जीवन संचारी है।।

बसंत कुमार श्रीवास(नरगोड़ा)
रामकृष्ण मिशन आश्रम नारायणपुर

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