साहित्य

लघु कहानी- धुँधलाते रिश्ते

डॉ ऋतु अग्रवाल

मनोहर बालकनी में पिछले एक घंटे से अकेले बैठे थे। अखबार भी कितना ही पढ़ते? शब्दों एवं ख़बरों की भी अपनी ही सीमा होती है। इस बीच दो प्याली चाय पी चुके थे। नौकर मनोज नाश्ता पूछ कर गया था पर मनोहर का मन ही नहीं था कुछ खाने का। बीती रात काफी झड़प हुई थी मनोहर की अपने बेटे से। पूरी रात बेटे की बातें और पत्नी का ठंडा जवाब उन्हें कौंचता रहा।
सुबह से ही मनोहर बालकनी में बैठे अपना अकेलापन बिताने का प्रयास कर रहे थे पर बेटे की बातों ने जो आईना उन्हें दिखाया है उसमें बार-बार उनका वह अक्स उभर रहा था जिस पर कभी उन्हें बहुत घमंड था।
“सुमेश! तुम्हें खाना खाते ही कमरे में भागने की क्या पड़ी रहती है? बरखुद्दार! कुछ देर हमारे पास भी बैठो। अब हम रिटायर हो चुके हैं, ज़िम्मेदारियाँ कम हो गई हैं हमारी। बैठो हमारे साथ, कुछ गपशप करते हैं ।” मनोहर ने कमरे में जाते बेटे को टोका।
“जी! पर मेरे पास अभी समय नहीं है। कुछ फाइलें पूरी करनी है।” सुमे के शब्द बिल्कुल ठंडे थे।
“थोड़ी देर बात कर लेना।” मनोहर ने आग्रह किया।
“जी नहीं! पहले काम। आप ही तो कहते थे न कि पहले काम बाद में घर और रिश्ते?” सुमेश का उत्तर दृढ़ था।
“अच्छा तो अब हमें सिखाओगे।” मनोहर की आँखें जल उठीं।
“जी नहीं! आपसे सीख चुका हूँ।” कहकर सुमेश कमरे में चला गया और दरवाजा बंद कर लिया।
“देख रही हो अपने लाडले को? यही संस्कार है इसके?” मनोहर पत्नी दमयंती पर चिल्लाए।
‌ ‌‌”जी! यह संस्कार तो आपके हैं। बच्चे वही सीखते हैं जो वह देखते हैं।” दमयंती ने जवाब दिया।
” हाँ! हाँ!” तो मैंने यह सब किसके लिए किया? तुम लोग खुशी से सुखपूर्वक जियो इसीलिए तो।” मनोहर की आवाज में दर्प था।
“सुखपूर्वक खुशी से जीने के लिए प्यार एवं साथ की आवश्यकता होती है न कि कठोर व्यवहार, डाँट-फटकार और अहंकार की। ख़ैर! आपको न मैं पहले समझा पाई थी और अब समझाना ही नहीं चाहती हूँ। मुझे सोना है, कल मेरी एनजीओ की मीटिंग है।” कहकर दमयंती भी अपने कमरे में चली गई ।
न जाने मनोहर कब तक डाइनिंग टेबल पर बैठे रहे। रह-रह कर याद आता रहा उन्हें कि कैसे सुमेश और दमयंती कुछ पल उनके साथ बिताने के लिए मनुहार करते थे पर उन्हें तो ढेर सारा पैसा कमाना था। दमयंती तो केवल बिजनेस पार्टी में मुस्कुराता हुआ चेहरा भर रहती और सुमेश का हर क्षेत्र में अव्वल आना उनकी प्राथमिकता नहीं प्रदर्शन का मसला होता था। थक-हार कर मनोहर भी अपने कमरे में चले गए।
“साहब! नाश्ता ले आऊँ?” मनोज ने पूछा।
“नहीं! भूख नहीं है। कहते हुए मनोहर की आँखों में पानी भर आया। सामने टँगी मनोहर, दमयंती और सुमेश की तस्वीर धुँधली दिखने लगी।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश

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