साहित्य

मैंने इनता कुछ खोया हैं

संजय कुमार

मैंने इनता कुछ खोया हैं अब पाने से डर लगता हैं,
मेरे जीवन में आने वाली,खुशियों से भी डर लगता हैं,

बीच रास्ते पर उसने मेरा हाथ बेरुखी से हाथ छोड़ दिया,
आज अपने होने का वादा करेंउसके वादे से डर लगता हैं,

मैंने इनता कुछ खोया हैं अब पाने से डर लगता हैं,
बीच भंवर में खोया हुँ अब किनारे से डर लगता हैं,

अंधेरों का साथ रहा हैं अब उजालों से डर लगता हैं,
अँधेरी रातों का साथ हैं अब सेवरों से डर लगता हैं,

मैंने इनता कुछ खोया हैं अब पाने से डर लगता हैं,
जो कभी जिस्म था मेरा अब उसके साये से डर लगता हैं,

तिल तिल कर हर वक़्त मरा हुँ,अब जीने से डर लगता हैं
बदकिस्मती का मारा हूं अब किस्मत से भी डर लगता है,

मैंने इनता कुछ खोया हैं अब पाने से डर लगता हैं,
जो अपना था घर कभी, अब वो मकान लगता हैं,

रिश्तों नें बार बार छला,अब रिश्ते बनाने से डर लगता हैं,
टुटा दिल,छूटा रिश्ता जुड़े पर अब वो भी पराया लगता हैं

मैंने इनता कुछ खोया हैं अब पाने से डर लगता हैं,
धूप में इनता जला हुँ अब छायों से भी डर लगता हैं,

……………….संजय कुमार आगरा…………….
…………… सर्वाधिकार सुरक्षित……………….

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