
माता रानी के नवरात्र आए हैं,
मन के आँगन में एक हल्की सी आहट हुई है,
जैसे किसी ने चुपके से
विश्वास का दीप जला दिया हो।
मैंने घर ही नहीं सजाया,
अपने भीतर के कोनों को भी सँवारा है,
जहाँ कभी संदेह था,
वहाँ आज श्रद्धा के पुष्प बिछाए हैं।
माँ,
आपके स्वागत में दीपक ही नहीं,
मेरे विचार भी प्रज्वलित हैं,
आपकी कृपा से ही
अंधकारमय मन में उजाला उतर आया है।
नवरात्रि का यह पर्व
सिर्फ उत्सव का शोर नहीं,
यह तो आत्म साधना का पावन क्षण है,
जहाँ हर दिन एक विकार टूटता है
और एक नया संस्कार जन्म लेता है।
कभी आप शैलपुत्री बनकर साहस देती हैं,
तो कभी कात्यायनी बनकर रक्षा करती हैं,
आपके हर स्वरूप में
जीवन का एक सुंदर संदेश छिपा है।
मैंने अपने अहंकार को
आपके चरणों में समर्पित कर दिया है,
और बदले में पाया है—
एक शांत, निर्मल हृदय।
माँ,
आपके आगमन से
यह संसार ही नहीं,
मेरा अंतर्मन भी महक उठा है।
स्वागत है आपका—
इन भावों की पगडंडी पर,
जहाँ हर शब्द
आपके चरणों का स्पर्श पाने को आतुर है।
जय माता दी।
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)




