साहित्य

डिग्री की दास्तान

सुमन बिष्ट

आजकल डिग्री बड़ी बेचैन रहती है,
अलमारी में टंगी-टंगी हैरान रहती है।
सोचती है,इतने सालों की पढ़ाई के बाद
फिर जेब क्यों खाली और परेशान रहती है।

किताबों के जंगल में जो वीर निकल आए,
सर्टिफिकेटों की सेना भी साथ ले आए।
पर नौकरी की रणभूमि में जब कदम रखा,
तो अनुभव और हुनर तलवार बनकर छा गए।

कॉलेजों ने सपनों के महल बहुत सजाए,
डिग्रियों के रंगीन काग़ज़ के ढेर खूब लगाए।
पर बाज़ार की चौखट पर जब सच सामने आया,
तो काग़ज़ के सारे ताज हवा में उड़ जाए।

कुछ लोग बिना डिग्री के भी कमाल कर गए,
छोटे से हुनर से ही बड़ा धमाल कर गए।
और जो फाइलों में सपने सजाए बैठे थे,
वे प्रतियोगिता के फॉर्म ही भरते रह गए।

डिग्री अब समझदार बहुत हो गई है,
दीवार पर टंगकर भी मशहूर हो गई है।
लोगों को चुपचाप यही समझाती रहती,
अब मेहनत और हुनर से ही दुनिया दूर हो गई है।

इसलिए
ऐ नौजवानो! बस डिग्रियां न सँभालो,
अपने में हुनर की भी थोड़ी सी मशाल जला लो।
डिग्री तो पहचान है, मान और सम्मान है,
पर उसके साथ थोड़ा स्वकौशल भी जगा लो।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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