
हे ! निर्गुण ब्रहम हे ! निर्विकार ,
हे ! अजर,अमर हे! अविनाशी ,
किसी तरह भी , मैं तुमको ,
परिभाषित नहीं कर पाती ।
किस विधि देखूं मैं . तुमको ,
हे ! असीम, अदृश्य , अगोचर ,
निराकार हो , निर्निमेष हो ,
तुम हो जग के बाहर-भीतर।
कहां – कहाँ ना ढूंढते फिरते ,
नैना तुमको हे अविनाशी ,
अगम, अखण्ड ,अक्षुण्ण हो ,
तुम्हीं हो घट – घट वासी ।
किस तरह अभिव्यक्त करूं ,
तुम अवर्णनीय , अकथ्य हो ,
तुम निर्लिप्त हो, विरक्त हो ,
कण- कण में तुम व्याप्त हो।
सरोज शर्मा
दिल्ली



