साहित्य

ग़ज़ल

पंडित मुल्क राज " "आकाश"

तुम्हारे इन अल्फाजों में अजब तासीर देखी है,
कि जैसे रूह ने अपनी कोई तहरीर देखी है।

यूं ही दिल की हदों को पार कर जाते नहीं ये लफ्ज़,
हमने इनमें मुहब्बत की मुकम्मल पीर देखी है।

सजे हैं कोरे कागज पर जो ये मोती से अक्षर सब,
इनमें खिलते हुए मौसम की एक तस्वीर देखी है।

जमाने की ज़फ़ाओ में जहां हम डगमगाए थे,
वहां इन मीठे लफ्जों की ही बस तकदीर देखी।

मिटा कर खुद को जो लफ्जों में ढल जाते हैं ए दोस्त,
उन्हीं में हमने बस आकाश” की जागीर देखी है।

पंडित मुल्क राज ” “आकाश”

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