साहित्य

एक ग़ज़ल

नागेंद्र नाथ गुप्ता

उनका तो रंग ढंग तरीका बदल गया,
गुलशन बदल गया है बगीचा बदल गया।

बरसी न एक बूँद मगर भींग हम गये,
करने को गुफ्तगूँ का सलीका बदल गया।

क्यों कारवाँ को छोड़ दिया दूर आपने,
जो संग चल रहा था जखीरा बदल गया।

ख्वाहिश थी चाँद तारों की जो रह गई धरी,
पर्दे पड़े तमाम दरीचा बदल गया।

दुनिया जहाँ की फिक्र नहीं आप कीजिए,
कैसे तुम्हारा आज कबीला बदल गया।

उम्मीद थी न तुमसे सनम बेवफाई की,
मौकापरस्त कैसे सफीना बदल गया।
*नागेंद्र नाथ गुप्ता, ठाणे (मुंबई)*

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