
हर कण में हम देखें उसको
जो रहता घट-घट में राम
सघन नींद में स्वप्न दिखाकर
कलियों के संग हॅंसता राम।
जग में भरता भोर सुनहरा
कोयल के संग गाता राम
हिरणों के संग भरे कुलांचें
चन्दा संग मुस्काता राम।
बादल गरजे बिजली तड़के
दशों दिशा में छाता राम
ऋतुओं के परिवर्तन संग में
फसलों में लहराता राम।
परस पवन है उसका प्यारा
नदियों का है रूप निराला
धरती अम्बर सब हैं उसके
सागर में मिल जाता राम।
डॉ. उमा रानी दुबे
जयपुर, राजस्थान




