साहित्य

शाद्वल 🌿🌾

ममता झा मेधा 

*हरी चादर धरती की*

दूर तक फैला शाद्वल,

जैसे धरती ने ओढ़ी हो हरी शॉल।

पांव रखो तो लगे मखमल,

हवा छुए तो बजे जैसे मृदंग-ढोल।

 

न कोई ईंट, न कोई गारा,

बस कुदरत का खुला दालान है।

तितली का स्कूल, जुगनू का घर,

ये हर जीव का सम्मान है।

 

ओस की बूंदें मोती बनकर,

घास की नोक पर सजती हैं।

सुबह की किरण जब चूमे इनको,

तो पूरी वादी जगमगाती है।

 

गाय चरे, बकरी कूदे,

बच्चे इस पर लोट लगाएं।

थका हुआ राही आकर बैठे,

शाद्वल सबको गोद में सुलाए।

 

*। ये शाद्वल भी तो माँ है,*

*बिना बोले सब कुछ देती है।*

*ना बिल भेजती, ना हिसाब रखती,*

*बस हरी छाँव देती रहती है ।।*

 

कंक्रीट के जंगल में भूल गए हम,

घास पर नंगे पांव चलने का सुख।

शाद्वल पुकारे “आ जाओ एक बार,

छोड़ दो मोबाइल, महसूस करो मुझको।”

 

*एक शेर शाद्वल के नाम:*

_“शहर की गर्मी से जब दम घुटने लगे,_

_आ जाना किसी शाद्वल के पहलू में।_

_ये घास का कालीन जो बिछा है,_

_सुकून मिलता है इसी के जादू में।।🌳💚

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ममता झा मेधा

डालटेनगंज

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