साहित्य

चलो हम भी शायर बन जाते है

कुलदीप सिंह रुहेला

चलो हम भी शायर बन जाते हैं,
तेरे नाम के दीप जलाते हैं,
हर धड़कन को सुर में ढालकर,
तेरे गीत ही गुनगुनाते हैं।

तेरी यादों की भीनी खुशबू,
साँसों में यूँ उतर जाती है,
जैसे चाँदनी रात भी चुपके से,
रूह को छूकर गुजर जाती है।

तेरी आँखों के गहरे सागर में,
मैं खुद को भूल ही जाता हूँ,
तेरी एक मुस्कान की खातिर,
सौ ग़म हँसकर सह जाता हूँ।

तेरे लफ़्ज़ों की मीठी बारिश,
दिल की धरती भिगो जाती है,
सूखे अरमानों की बगिया में,
फिर से बहारें ले आती है।

तेरे संग हर पल लगे जैसे,
जन्नत की कोई राह मिले,
तेरे बिन ये दुनिया सूनी,
जैसे बंजर सी धरती हो जाती हैं ।

मैं तेरा हूँ, तू मेरी रहे,
बस इतना सा अफसाना है,
इस प्रेम की पावन ज्वाला में,
खुद को तुझमें खो जाना है।

तू पास रहे तो साँस चले,
तू दूर तो सब वीराना है,
तेरे नाम से शुरू कहानी हो
तेरे नाम पे ही ठहर जाना है।

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश
मौलिक अप्रकाशित रचना

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