
जहाँ इच्छाओं का शोर थम जाए,
और मन स्वयं से ही मिल जाए,
वहीं कहीं एक पथ निकलता है
वैरागी जीवन का, शांत, सरल, सच्चा।
न कोई लोभ, न मोह का बंधन,
न सपनों का भारी आवरण,
बस एक धूप सी सादगी होती है,
जो आत्मा को उजाला देती है।
वैरागी वो, जो हार कर नहीं,
बल्कि सब पा कर भी त्याग करे,
जिसके भीतर का सागर शांत हो,
और लहरें भी मौन संवाद करें।
जहाँ न चाहतों का कोई भार हो,
न अपनों-परायों का व्यवहार हो,
हर चेहरा एक समान लगे,
हर रिश्ता बस एक विचार हो।
वो चलता है बिना किसी आस के,
फिर भी हर पल में विश्वास लिए,
क्योंकि उसे पता है—
जो छूट गया, वो कभी उसका था ही नहीं।
वैरागी होना पलायन नहीं,
बल्कि सबसे गहरा सामना है,
अपने ही भीतर उतर कर
स्वयं को समझ पाने का अफसाना है।
जहाँ शब्द कम और अनुभूति अधिक हो,
जहाँ मौन ही सबसे बड़ी सीख हो,
वहीं जन्म लेता है एक वैरागी—
जो जग में रहकर भी जग से अतीत हो।
*अविनाश श्रीवास्तव*
*उत्तर प्रदेश महराजगंज*




