साहित्य

प्रकृति का क्रंदन

पूर्णिमा सुमन

नीले अंबर, शीतल धारा, जीवन का यह मूल है,
मानव की नादानी से, कुदरत आज धूल है।
कंक्रीट के इन जंगलों में, हम साँसें ढूँढ रहे हैं,
पेड़ काटकर अपनी ही, बर्बादी बुन रहे हैं।

थम जाओ अब ऐ इंसान, यह वक्त का तकाज़ा है,
पृथ्वी है तो हम हैं, बस यही एक आगाज़ है।
न काटो इसे, न लूटो इसे, यह वरदान पुरानी है,
आने वाली नस्लों को भी, देखनी ये जिंदगानी है।

लगाओ पौधे, बचाओ जल, स्वच्छ करो यह वायु,
प्रकृति के संरक्षण से ही, सजेगी अपनी आयु।
मिटा दो स्वार्थ का साया, प्रेम का दीप जलाओ,
आज फिर से तुम प्रकृति को, ‘माँ’ कह कर अपनाओ।

अब न जागे जो तुम, तो बचना मुश्किल है मानो,
बर्बाद हुई जो वसुंधरा, तो अंत निकट है जानो।
चेतावनी है कुदरत की, इसे मज़ाक न समझो तुम,
मिट गए जो प्रकृति, फिर कैसे धरा बचाओगे।

आओ मिलकर संकल्प लें, एक नई सुबह हम लाएँगे,
मिट्टी, जल और गगन को मिलकर, फिर से स्वर्ग बनाएँगे।
सुरक्षित होगी धरा हमारी, खुशहाली हर द्वार होगी,
प्रकृति के इस संरक्षण में ही, मानव की जयकार होगी।

पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद

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