साहित्य

पृथ्वी पुकार रही है

दिनेश पाल सिंह 'दिव्य'

मत काटो वन की साँसों को, मत नदियों का मान हरो,
धरती माँ की कोख न नोचो, लोभ तजो, कुछ ज्ञान धरो।

जिस मिट्टी ने जन्म दिया है, उसका ऋण पहचानो तुम,
हरियाली के पावन गहने, फिर से उसे पहनाओ तुम।

सूखी नदियाँ रोती देखो, पर्वत भी लाचार हुए,
मानव के अंधे स्वार्थों से, मौसम सब बीमार हुए।

अब भी समय है जागो मानव, जीवन का उपकार करो,
एक नहीं हर वर्ष सैकड़ों, नव पौधों से प्यार करो।

जल की हर बूंद अमृत समझो, व्यर्थ इसे बहने न दो,
नीले गगन की शीतल छाया, धुएँ तले ढहने न दो।

आओ मिलकर शपथ उठाएँ, नव अभियान चलाएँ हम,
धरती को फिर स्वर्ग बनाएँ, हर आँगन वन लाएँ हम।

जब-जब मानव सुधर जाएगा, संकट सारा टल जाएगा,
माँ पृथ्वी के चरण सँवरते, भविष्य स्वर्णिम फल जाएगा।

:
धरती रोई, नभ ने पूछा — कब मानव सुधरेगा?
जब वृक्षों का मान बढ़ेगा, तब भविष्य निखरेगा। 🌱🌍🙏

जय धरा, जय जीवन, जय हरित संसार!

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश

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