साहित्य

वृक्ष की पुकार

अनिता निधि

​शुष्क हुआ मैं, देह हुई है जर्जर,

हे मानव! यह क्या किया तूने बन दानव?

कभी पल्लव, पुष्प, फलों से था मैं आच्छादित,

अब खड़ा हूँ असहाय, निज वैभव से विहीन।

​मुझसे ही तो यह दुनिया सुंदर और रंगीन है,

मुझसे ही चारों ओर फैली यह हरियाली है।

पथिकों को शीतल छाया, सुकून मैं देता था,

लिपटे रहते थे बच्चे, ऐसा मेरा स्नेह था।

​मेरे नीचे सजती थीं चौपालें और पंचायतें,

सुस्ताते थे लोग, करते थे अपनी बातें।

मेरी शाखाओं पर ही तो था पक्षियों का बसेरा,

मैं ही ‘प्राणवायु’ दे, मिटाता संकट का घेरा।

​मुझसे ही आकर्षित हो घनघोर बादल आते हैं,

तप्त धरा की प्यास बुझा, जीवन दे जाते हैं।

मुझसे ही खिलता वसंत, सावन की हरियाली है,

संतुलित पर्यावरण की, मैं ही तो रखवाली है।

​कई आपदाओं से मैंने वसुधा को बचाया है,

पर मानव! तूने मेरा ही धन अतुलित लुटाया है।

सुन ले मेरी करुण पुकार, अब तो तू जाग जा,

कुल्हाड़ी उठाना छोड़, विनाश से तू भाग जा।

​मत काटो मुझे, मत करो मेरा सर्वनाश,

प्रकृति के संरक्षण में ही है सबका विकास।

गुजारिश है मेरी, रुक जाओ… अब तो रुक जाओ,

अपनी भावी पीढ़ी का तुम भविष्य बचाओ।

​क्या दोगे उन्हें? केवल धुआँ और बंजर जमीन?

या फिर वही हरियाली, जो थी कभी अति प्रवीन!? डॉ. अनिता निधि जमशेदपुर, झारखंड

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