
कहां जंग से मसले हल हुआ करते हैं,
इनसे तो नसले ही खत्म हुआ करते हैं।
न जीत किसी की न हार किसी की होती है,
लाशो पर खड़े बस मकतल हुआ करते हैं।
बारूद की गंध में सुलगती है ये दुनिया,
धुएं में ख्वाब सब ओझल हुआ करते हैं।
मिट्टी भी रोती है अपनों के बिछड़ने पर,
खेतों में कहां फिर संभल हुआ करते हैं।
जो अमन की राह में कदम बढ़ाते हैं,
वही लोग दरअसल मुकम्मल हुआ करते हैं।
बातचीत से सुलझती है दिल की गिरहे,
मोहब्बत से ही हसीन पल हुआ करते हैं।
चलो नफरतों के चिरागों को बुझा दे आओ,
अमन से ही रोशन मुस्तक बिल हुआ करते हैं।
खुले आसमान में उड़ने दो परिंदे को,
“आकाश” खुशियों के फल हुआ करते हैं।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
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मकतल.. वधशाला
मुस्तकबिल.. भविष्य या आने वाला समय



