
बढ़ती गर्मी से त्राहि-त्राहि
विकट है गर्मी कुछ रहा ना सुझाई।
पसीनो से तरबतर हो रहे।
खाना बनाने का मन ना भाई।
बाहर से मंगवाना और भी मुश्किल,
खा ना पाएंगे तेल मिठाई।
खरबूज तरबूज से मन लागा।
सलाद देखकर जो था भागा
अब खिचड़ी सलाद ही स्वाद लगे भाई।
पी पी कर पानी पेट है फूला।
शरबत और मैंगो शेक भी ना भूला।
अभी तो शुरुआत है पूरी गर्मी कैसे कटुंगा भाई?
बिजली विभाग ने बिजली है उड़ाई।
बढ़ती गर्मी से त्राहि-त्राहि।
कहां जाकर बैठ कुछ रहना सुझाई।
ईश्वर भी अब क्या कर लेगा?
पर्यावरण का ध्यान जब मानव ना करेगा।
उगा दिए कंक्रीट के जंगल,
हरियाली कहीं नजर ना आई।
फलों के ऊंचे वृक्ष लुप्त हो गए,
बरगद पीपल सुप्त हो गए,
नीम भी कहां रहा दिखाई?
हे मानव, करना था विकास पर यह तो विनाश हो गया भाई।
गर्मी में मचाई त्राहि-त्राहि।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा




