साहित्य

मजदूर

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

कठिन परिश्रम कर सदा,पाले निज परिवार।
शीत ताप वर्षा सहे,सँग मौसम की मार।
भवन कारखाने सभी, करता है निर्माण,
अन्न प्रदाता है सहे,फिर भी कष्ट अपार।।

श्रमजीवी मजदूर हैं,धर्म-कर्म पहचान।
नित्य बहाते श्वेद वो,रखते सबका ध्यान।
करें काम दिन-रात जो, उनको सतत् प्रणाम,
जिसके वे हकदार है, मिलें न क्यों सम्मान?!

खून पसीना नित बहा, श्रमिक करे है काम।
बोझा ढोता शीश पर, तनिक नहीं आराम।
अति दुर्बल तन धूसरित, वस्त्र नहीं है देंह,
नहीं कर्म अनुरूप है ,इनको मिलता दाम।।

अधिकारी नेता सभी,एक दिवस कर शोर।
चुप होकर फिर बैठते, नहीं ताकते ओर।
झोली अपनी ही भरें, करवाते सब काम,
नहीं श्रमिक की जिंदगी, आए सुख की भोर।।

श्रमिकों को शुभकामना, दिवस आज मजदूर।
भोजन इनकी थाल हो,संग खुशी भरपूर।
विपदाएं आए नहीं,पथ प्रशस्त हो नित्य,
बनें स्वयं की ढाल ये, जैसे रण में सूर।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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