
आसमान और डगरियाँ, धूप भी अंगार सी,
बचपन से जवानी तोड़ती, हर चोट लाचार सी।
क्यूँ पूछे “थकते हो तुम भी”, बस काम का पहरा है,
धूप चुभे, तन झुलसे, रेत लिपटे, फिर भी वो इंकार सी।
गर्म औज़ार, तपती साँसें – छाँव से इंकार वो,
सामने महल बनते रहे, वो खड़ी दीवार सी।
लू चले तो रूह जले, रेत उड़े शोलों सी,
और पसीना बदन को चूमे, जैसे कोई शृंगार सी।
“श्रम” को जो सम्मान दे, वही सच्चा संसार है,
वरना ‘अर्पण’ ये दुनिया, बस एक बाज़ार सी।
✍️ चॉंदनी कुमारी वर्मा झारखण्ड (बोकारो)



