
चलो एक पौधा माँ के नाम लगाते हैं,
उसकी देखभाल माँ जैसी करते हैं।
नियमित जल-सिंचन से तृप्त रखते हैं,
प्यार -दुलार और मनुहार करते हैं।
खर पतवार से दूर रख घेरा बनाते हैं,
कोई अनिष्ट न करें, ये ख्याल रखते हैं।
पौधा वृक्ष बन जाए,ये विश्वास करते हैं,
उस छाया में माँ जैसा एहसास पाते हैं।
उस वृक्ष के फल, फूल और पत्तों में,
माँ की खुशबू को हम जीवित पाते हैं।
रचनाकार –
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक कृति,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।



