
कुर्सी की है अंधी जंग,
नेता बदले रोज़ नए रंग।
गठबंधन का खेल पुराना,
जनता का बस हुआ बहाना।
आज इधर तो कल हैं वहां,
निष्ठा खोई, सोचें सब कहां?
सिद्धांतों का सौदा सरेआम,
सत्ता पाना एकमात्र काम।
टूट रहे वादों के महल,
मची हुई है भारी हलचल।
नीतिहीन सरकारें बनतीं,
जनता बस दुःख-दर्द सहती।
विकास की गति हुई मंद,
बंद पड़े हैं सारे प्रबंध।
कब बदलेगा यह परिवेश?
संकट में है अपना देश।
स्वार्थ सिद्ध की यह होड़,
दिखती नहीं सफलता का छोर।
अस्थिरता का गहरा साया,
कैसी यह सत्ता की माया! वसंत कुंज, नई दिल्ली-70



