
कुछ रिश्ते आवाज़ नहीं करते
फिर भी उम्र भर सुनाई देते हैं।
कुछ रिश्ते धूप की तरह,
चुपचाप आँगन में उतरते हैं,
ना कोई वादा करते हैं,
ना ही शब्दों में बिखरते हैं।
बस एक एहसास बनकर
मन के भीतर रहते हैं,
भीड़ भरे हर मौसम में
अकेलेपन को सहते हैं।
वे रिश्ते नदी की धारा जैसे,
धीरे-धीरे बहते हैं,
दूर भले ही हो जाएँ,
फिर भी दिल में रहते हैं।
कभी माँ की ममता बनकर,
कभी पिता की छाँव बनते,
कभी किसी मित्र की हँसी में
जीवन के घाव सिलते।
उनकी खामोशी में भी
अनगिनत संवाद होते हैं,
कुछ रिश्ते आवाज़ नहीं करते,
फिर भी उम्र भर सुनाई देते हैं।
शशि कांत श्रीवास्तव




