
शहर की सड़कों पर धूप अंगारे बरसाती है,
सीमेंट की दीवारों में हर साँस घबराती है।
कटते पेड़ों की चीखें अब कौन यहाँ सुनता है,
बढ़ता तापमान धीरे-धीरे जीवन बुनता है।
छतों पर तपती दोपहरी, गलियों में धुआँ भारी,
थकी हुई सी शाम लगे, सूनी हर फुलवारी।
कूलर, पंखे, ए.सी. भी राहत कम दे पाते हैं,
बिन पेड़ों के पंछी भी अपना घर खो जाते हैं।
पर गाँव की सुबह अभी भी ठंडी हवा सुनाती,
पीपल की छाँव तले दादी मीठी कथा सुनाती।
मिट्टी की सौंधी खुशबू मन को शांति देती है,
तालाबों की ठंडी लहरें जीवन में हँसी भरती हैं।
आमों से लदी बगिया जब मंद हवा में झूमे,
खेतों की हरियाली मन के सूखे भावों को चूमे।
वहीं प्रकृति अब भी मानव को जीना सिखलाती है,
धरती माँ की गोदी में सच्ची नींद तो आती है।
आओ फिर से वृक्ष लगाएँ, हर आँगन हर द्वारे,
धरती को हरियाली दें हम मिलकर सारे।
यदि पेड़ों को काटेंगे तो जीवन जल जाएगा,
प्रकृति रूठी तो मानव का भविष्य बदल जाएगा।
पेड़ लगाना ही अब सच्चा उत्सव कहलाए,
तभी गाँव का सुकून और धरती की मुस्कान बच पाए।
~ जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”




