साहित्य

गीत

राम किशोर वर्मा

बीड़ी में कश मार-मार कर, चस्का खूब लगाया ।

खेल-खेल में मित्रों ने भी, मुँह से धुआँ उड़ाया ।।१।।

✍️

दद्दा को बीड़ी-माचिस की, आदत पड़ी हुई थी ।

बाँधे मुट्ठी पीने की भी, लत तक नई लगी थी ।।

बीच-बीच में खाँसी-खुर्रा, धस्का तक भी आया ।

बीड़ी में कश मार-मार कर, चस्का खूब लगाया ।।२।।

✍️

धीरे-धीरे मित्रों से ले, गुटखा-खैनी खाई ।

बना-बना कर सिगरट छल्ले, बहुत शान दिखलाई ।‌।

मुंँह में कैंसर हुआ एक दिन, होंठ सूज लटकाया ।

बीड़ी में कश मार-मार कर, चस्का खूब लगाया ।‌।३।।

✍️

बिना नशे के काम न होता, पड़ जाती है आदत ।

दिल-दिमाग फिर काम न करते, आती पूरी आफत ।।

नौबत आ जाती इलाज की, रुपया व्यर्थ गँवाया ।

बीड़ी में कश मार-मार कर, चस्का खूब लगाया ।।४।।

✍️

तम्बाकू की लत कब अच्छी, करे यह स्वास्थ्य खराब ।

मुँह से जब बदबू आती तो, लोग खाएँ हैं ताव ।।

तन-मन-धन बेकार करे यह, सबने ही समझाया ।

बीड़ी में कश मार-मार कर, चस्का खूब लगाया ।‌।५।।

*-राम किशोर वर्मा*

जयपुर (राजस्थान)


दिनांक:- २५-०५-२०२६ सोमवार

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