
बीड़ी में कश मार-मार कर, चस्का खूब लगाया ।
खेल-खेल में मित्रों ने भी, मुँह से धुआँ उड़ाया ।।१।।
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दद्दा को बीड़ी-माचिस की, आदत पड़ी हुई थी ।
बाँधे मुट्ठी पीने की भी, लत तक नई लगी थी ।।
बीच-बीच में खाँसी-खुर्रा, धस्का तक भी आया ।
बीड़ी में कश मार-मार कर, चस्का खूब लगाया ।।२।।
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धीरे-धीरे मित्रों से ले, गुटखा-खैनी खाई ।
बना-बना कर सिगरट छल्ले, बहुत शान दिखलाई ।।
मुंँह में कैंसर हुआ एक दिन, होंठ सूज लटकाया ।
बीड़ी में कश मार-मार कर, चस्का खूब लगाया ।।३।।
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बिना नशे के काम न होता, पड़ जाती है आदत ।
दिल-दिमाग फिर काम न करते, आती पूरी आफत ।।
नौबत आ जाती इलाज की, रुपया व्यर्थ गँवाया ।
बीड़ी में कश मार-मार कर, चस्का खूब लगाया ।।४।।
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तम्बाकू की लत कब अच्छी, करे यह स्वास्थ्य खराब ।
मुँह से जब बदबू आती तो, लोग खाएँ हैं ताव ।।
तन-मन-धन बेकार करे यह, सबने ही समझाया ।
बीड़ी में कश मार-मार कर, चस्का खूब लगाया ।।५।।
*-राम किशोर वर्मा*
जयपुर (राजस्थान)
दिनांक:- २५-०५-२०२६ सोमवार




