
“दोराहा”
चलना ही मेरी ज़िंदगी,
रुकना है मौत मेरी।
दोराहे पर खड़ी हूँ,
बस इकराह है पकड़नी।
जिस राह पर चलूँगी,
काँटे सब चुन लूँगी।
हौसलों को अपने,
यूँ उड़ान भरने दूँगी।
कारवाँ कोई भी गुज़रे,
मन-विश्वास न डिगेगा।
लक्ष्य को बढ़ते कदम,
हर सोपान पर दृढ़ होंगे।
भविष्य जोहतीं निगाहें,
मुस्कुरा कर चमकेंगीं।
निष्ठा,लगन,विश्वास से
सफलता का आस्मांँ संग होगा।।
द्वारा – सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन,
सद्य: नि:सृति,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।



