साहित्य

नहीं फर्क पड़ता किसी को

बंदना मिश्रा 

अंजाम था बच्चा

मां की मौत से।

मां की बंद आंखों को

निंद समझ बैठा

पकड़ कर मां की

साड़ी खींच रहा

और साथ ही साथ

कहता जा रहा

उठ मुझे रोटी दे दे।

बड़ी भूख लगी है।

मां एक तरफ़ लुढ़क गई

बच्चा फिर भी

समझ ना पाया

भूख से बिलबिलाया।

तमाशा देखने वाले

आस पास खड़े हो गए।

उस मासूम की मासूमियत पर

तरस ना आया।

लिया हाथ में मोबाइल

वीडियो बनाने लगे।

भूख से बिलबिला रहा है

मासूम लोगो को दिखाने लगे।

सरकार और सिस्टम को

गालियां दे रहे रहे थे।

खुद माइक ले कर

बच्चे को दिखा रहे थे।

अरे! शर्म करो

जरा सा भी

अगर बचा है

तुम भी सरकार

और सिस्टम का हिस्सा हो।

अपना कर्तव्य तो पहले पूरा करो।

उस बच्चे की भूख

तो मिटाओ

वीडियो बाद में बनाओ।

ले जाओ उस अभागीन की

लाश को दफनाओं

जो अपने ख्वाबों के

साथ ही चल बसी।

उसने भी सोचा होगा

बेटे को पढ़ा लिखा कर

ज़िन्दगी सवार देंगी।

भीख मांगेगी खुद

बच्चे को इससे दूर रखेगी।

मगर उसे क्या पता

उसका बच्चा एक

निवाले को भी तरसेगा।

हाथ में ले मोबाइल वाला

वीडियो बना अपना लाइक

और कमेंट बढाएगा।

©️✍️®️

बंदना मिश्रा

देवरिया उत्तर प्रदेश

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