साहित्य

गुज़र न जाए अपना जीवन यूँ ही

डॉ. अनुराधा

कल आज और कल की परिधि में,

टिका हुआ है सबका जीवन।

गत की सोच में कल की खोज में,

बीत न जाए आज का शुभ दिन।

 

जैसी करनी वैसी भरनी,

दुनियाँ भर ये तो सब जाने।

फिर भी करते हैं भूल खूब सारी,

पग-पग, हर दिन जाने अनजाने।

 

है न कोई भरोसा कल का,

आज ही है बस खास तेरा सुन।

कौन जाने कब होंगे प्यारे काल का,

जीयो हर पल मौलिक जीवन।

 

सच्ची राह पर रहो चलते,

कभी न होगी जिंदगी अधूरी।

अंतरात्मा की पुकार रहो सुनते,

जन्म भर बनो नेकी की प्रहरी।

***

*©® ✍ डॉ. अनुराधा डेनमार्क

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