
उड़ते छोर में छुपा जीवन-बाग ,
चेतना की आग का अनूठा राग ।
हवा संग कांपता यह लाल रंग ,
अस्तित्व की ख़ोज का निराला ढंग ।
वीणा के तार सी सूक्ष्म झंकार,
जैसे करुणा में रोए बुद्ध पहली बार।
दुपट्टा नहीं, यह आकांक्षाओं का वितान ,
माँ की सिसकी, बेटी का पहला आसमान
गति में छुपा इस सृष्टिका सार ,
स्थिरता तो केवल मृत्यु की पुकार
हवा के झोंकों में होने को लीन,
व्याकुल बूंद पाकर सागर ज़मीन।
अंतिम हिलोरें जब लेता यह छोर
सत्य को दिखाता हमें गहरा ओर
खूंटे से बंधे हम सब कठपुतली समान,
थोड़ी सी हवा में पालते अमरता अभिमान।
शून्य से शून्य की ओर यह उड़ान
सूक्ष्म से परम सूक्ष्म का संधान।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद,गुजरात।




