
प्रियतम मेरे जब तुम मेरे संग होते,
व्यथित कितना भी मेरा मन होता,
मेरे बोझिल मन का सब दुख हर लेते,
अंधेरे में उजाले की किरण बन जाते,
जिंदगी में मेरी आया था ऐसा अंधियारा,
जिससे निकल पाना था मुश्किल मेरा,
प्यार की छांव से ना देते आप सहारा,
मैं तो कर बैठी थी दुनिया से किनारा।
मेरे उदास चेहरे को देखकर,
आपकी निगाहें करती सवाल हजार,
फिर बिन कहे ही पढ़ लेती मेरा अंर्तमन,
आपको देखकर सवंरता मेरा तन मन।
कितनी भी उलझने आये जिंदगी मे,
आपका करुणा से भरा हृदय,
मेरे मन को पुलकित कर देता है,
मुझको जीने की नई राह दिखता है।
नीतू रवि गर्ग “कमलिनी”
चरथावल मुजफ्फरनगर उत्तरप्रदेश




