
दो जून की रोटी की खातिर,
कितनी मेहनत करनी पड़ती है।
सर्दी गर्मी या हो बरसात,
हक हलाल की कमाई करनी पड़ती है।
धनाढ्य वर्ग तो हमेशा खाता है,
अपनी पसंद के सारे पकवान।
फाकाकशी में दिन गुजरने वाले,
कैसे बुलाए अपने घर मेहमान?
कड़ी मशक्कत करने के बाद भी,
दो जून की रोटी तक मिलती नहीं।
अभाव में बीत गया जिनका जीवन,
खुशी की कली कभी खिलती नहीं।
दो जून की रोटी सिर्फ आटा नहीं,
यह गरीबों के संघर्षों की कहानी है।
थाली के भोजन का करो सदा मान,
यही सच्ची इंसानियत की निशानी है।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।



