साहित्य

प्रकृति-स्वर

दिनेश पाल सिंह 'दिव्य'

हरित धरा हँसे
नभ निहारे
शांत

नीली छटा फैली
बादल तैरे
स्वप्न

पवन गीत सुनाए
पत्ते नाचें
राग

सूरज किरण बिखरे
ओस चमके
प्रभात

नदी कलकल गाए
लहरें बोले
प्रेम

फूल हँसी बिखेरें
भौंरे झूमें
मधु

पर्वत अडिग खड़े
नभ को छूएँ
गौरव

चिड़िया तान सुनाए
भोर जगाए
जीवन

साँझ रंग सजाए
दिन ढले
सुकून

चाँदनी चादर डाले
तारे चमकें
रात

बरखा रिमझिम गाए
धरती भीगे
आनंद

माटी महक उठे
बीज फूटें
आशा

झरना धुन सुनाए
पथ बहाए
संगीत

वन-छाँव ठहरी
मन ठहरे
शांति

नभ में इंद्रधनुष
रंग बिखरे
उल्लास

शीतल हवा बहे
तन सहलाए
सुकून

पतझर पत्ते झरें
डाल कहे
परिवर्तन

बसंत रंग लाए
फूल खिलें
हर्ष

ग्रीष्म तपन जगे
छाँव बुलाए
विश्राम

हिम शिखर दमके
धूप खिले
चमके

नदी तट सुनसान
लहर पुकारे
एकांत

ओस कण झिलमिल
घास मुस्काए
प्रभा

गगन विस्तार कहे
सीमा छोड़ो
उड़ान

धरती आँचल दे
सबको पाले
ममता

प्रकृति स्वर गूँजे
मन झूमे
अनंत

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश

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